लहरा सलेमपुर पंचायत में 86 लाख के भुगतान पर गंभीर सवाल: सबूत देने के बाद भी कार्रवाई सिर्फ एक फर्म तक क्यों सीमित?
अलीगढ़ के बिजौली ब्लॉक की ग्राम पंचायत लहरा सलेमपुर में सरकारी धन के कथित गबन, फर्जी भुगतान और विभागीय जांच में लीपापोती का मामला अब और गंभीर होता जा रहा है। शिकायतकर्ता विष्णु गुप्ता का आरोप है कि उनके द्वारा भुगतान विवरण, वाउचर, स्क्रीनशॉट, जीएसटी निरस्तीकरण से जुड़े तकनीकी प्रमाण और शपथ-पत्र सहित कई ठोस साक्ष्य अधिकारियों को उपलब्ध कराए गए, इसके बावजूद विभागीय कार्रवाई केवल एक फर्म तक सीमित कर दी गई।
शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने दिनांक 01 जून 2026 को शपथ-पत्र सहित शिकायत देकर ग्राम पंचायत लहरा सलेमपुर में सरकारी धन के दुरुपयोग, फर्जी भुगतान, घटिया निर्माण कार्य, सामग्री आपूर्ति में अनियमितता, निरस्त जीएसटी नंबर पर भुगतान तथा ग्राम प्रधान, सचिव और भुगतान स्वीकृत करने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की भूमिका की भौतिक स्थलीय जांच की मांग की थी। इसके बाद IGRS पोर्टल पर शिकायत संदर्भ संख्या 40014326024869, 40014326026625 और 40014326027062 भी दर्ज कराई गईं।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इतने गंभीर मामले में निष्पक्ष जांच के बजाय केवल कागजी कार्रवाई की गई। जिला पंचायत राज अधिकारी, अलीगढ़ द्वारा पत्र संख्या 1953/7/पं०/आई०जी०आर०एस०/आख्या/2026-27, दिनांक 27 जून 2026 के माध्यम से दी गई आख्या को शिकायतकर्ता ने भ्रामक, अधूरी, एकतरफा और मुख्य दोषियों को बचाने वाली बताया है।
शिकायतकर्ता के अनुसार जिला कृषि अधिकारी, एक्सईएन और एडीओ की तीन सदस्यीय जांच टीम बनाई गई थी, लेकिन इस टीम ने न तो खुले रूप से मौके पर जांच की, न शिकायतकर्ता से संपर्क किया, न शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया, न दिए गए साक्ष्यों का परीक्षण किया और न ही जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच बंद कमरे में बैठकर तैयार की गई और वास्तविक भौतिक जांच से बचते हुए मामले को कागजी निस्तारण की ओर मोड़ दिया गया।
इस पूरे मामले में जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि जब इतने गंभीर साक्ष्य जिला स्तर पर उपलब्ध कराए गए और मुख्य विकास अधिकारी को भी स्क्रीनशॉट व प्रमाण दिए गए, तो कार्रवाई केवल एक फर्म तक सीमित क्यों रखी गई? यदि भुगतान ग्राम पंचायत खाते से हुआ, सरकारी पोर्टल और DSC के माध्यम से स्वीकृत हुआ, तो भुगतान स्वीकृत करने वाले अधिकारियों, ग्राम प्रधान और सचिव की जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई?
मामले में जी०डी० कंस्ट्रक्शन नामक फर्म को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि उक्त फर्म का GST लगभग 3 वर्षों से निरस्त था, इसके बावजूद इसी अवधि में ग्राम पंचायत से लगभग 86 लाख रुपये का भुगतान कर दिया गया। सवाल यह है कि निरस्त GST नंबर वाली फर्म को लगातार भुगतान कैसे होता रहा और भुगतान पास करने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं की गई?
शिकायतकर्ता का आरोप है कि पूरे प्रकरण को सरकारी धन के गबन, फर्जी भुगतान, घटिया निर्माण और अभिलेखीय हेरफेर के रूप में जांचने के बजाय केवल GST चोरी तक सीमित कर दिया गया। जबकि शिकायत में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, सामग्री आपूर्ति, माप पुस्तिका, बिल, वाउचर, कार्यस्थल सत्यापन और सरकारी धन के वास्तविक उपयोग जैसे गंभीर मुद्दे शामिल थे।
मामले में एक और चौंकाने वाला आरोप यह है कि जांच और कार्रवाई के दौरान ही दिनांक 25 जून 2026 को ग्राम पंचायत खाते से 6,81,000 रुपये की राशि 5 अलग-अलग वाउचर के माध्यम से “आध्या एसोसिएट्स” के खाते में ट्रांसफर कर दी गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि इस भुगतान की सूचना उन्होंने उसी दिन मुख्य विकास अधिकारी को स्क्रीनशॉट और साक्ष्यों सहित दी थी, लेकिन अब तक कोई प्रभावी रोक, जांच या कार्रवाई नहीं हुई।
शिकायतकर्ता ने मांग की है कि दिनांक 25 जून 2026 को हुए 6,81,000 रुपये के भुगतान की तकनीकी जांच कराई जाए। यह पता लगाया जाए कि भुगतान किस आदेश पर हुआ, किस यूजर आईडी से लॉगिन किया गया, किस IP एड्रेस से प्रक्रिया हुई, किस DSC से भुगतान स्वीकृत हुआ और कौन से बिल, वाउचर व दस्तावेज पोर्टल पर अपलोड किए गए।
शिकायतकर्ता का कहना है कि ग्राम पंचायत प्रोफाइल में 15 सदस्यों के नाम दर्ज हैं, लेकिन केवल 3 ईमेल आईडी और 2 मोबाइल नंबरों का उपयोग किया गया, जो जांच प्रक्रिया को और अधिक संदिग्ध बनाता है। शिकायतकर्ता के अनुसार यह जांच होनी चाहिए कि क्या वास्तव में सभी सदस्यों के बयान लिए गए या केवल कागजी औपचारिकता पूरी की गई।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि विभाग की कार्यप्रणाली इतनी लापरवाह और संदिग्ध प्रतीत होती है कि गंभीर आरोपों और साक्ष्यों के बावजूद शिकायतों का वास्तविक समाधान करने के बजाय IGRS पर आख्या लगाकर मामला बंद किया जा रहा है। शिकायतकर्ता के अनुसार यह केवल एक ग्राम पंचायत का मामला नहीं, बल्कि सरकारी धन की जवाबदेही, विभागीय पारदर्शिता और जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
शिकायतकर्ता के अनुसार शिकायत दिए हुए 30 दिन से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन वास्तविक दोषियों के विरुद्ध कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि मामले में निष्पक्ष उच्च स्तरीय भौतिक स्थलीय जांच और कानूनी कार्रवाई नहीं होती है, तो वह माननीय उच्च न्यायालय में वाद दायर करने को विवश होंगे। शिकायतकर्ता का कहना है कि इसकी पूर्ण जिम्मेदारी उन अधिकारियों की होगी जिन्होंने इस गंभीर मामले को दबाने का प्रयास किया और कार्रवाई करने के बजाय दोषियों को संरक्षण देने का कार्य किया।
शिकायतकर्ता ने मांग की है कि जिला पंचायत राज अधिकारी, अलीगढ़ की आख्या को तत्काल निरस्त कर शिकायत को पुनः खोला जाए। स्वतंत्र उच्च स्तरीय टीम से शिकायतकर्ता की उपस्थिति में मौके पर भौतिक स्थलीय जांच कराई जाए। ग्राम पंचायत सदस्यों के वास्तविक बयान दर्ज किए जाएं। 6,81,000 रुपये के भुगतान की तकनीकी जांच कराई जाए। ग्राम प्रधान, सचिव, भुगतान स्वीकृत करने वाले अधिकारी/कर्मचारी, संबंधित फर्म और जांच टीम की भूमिका की जांच कर दोषियों के विरुद्ध निलंबन, एफआईआर, धन वसूली और सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शिकायतकर्ता साक्ष्यों के साथ जांच की मांग कर रहा है, तो विभाग निष्पक्ष भौतिक जांच से पीछे क्यों हट रहा है? क्या IGRS पर आख्या लगाकर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं को दबाया जा रहा है? क्या जिला प्रशासन केवल एक फर्म पर कार्रवाई दिखाकर पूरे मामले की जवाबदेही से बच सकता है? और यदि इतने प्रमाणों के बावजूद भी कार्रवाई नहीं होती, तो आखिर इन अधिकारियों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
इस पूरे मामले ने अलीगढ़ में पंचायत स्तर पर भुगतान, जांच और जवाबदेही की व्यवस्था के साथ-साथ जिला स्तरीय प्रशासनिक निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई करता है या फिर एक और आख्या लगाकर शिकायत को बंद कर दिया जाता है।



