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ग्रामसभा की जमीन पर अवैध कब्जे की सूचना न देने पर प्रधान और लेखपाल के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट के 6 अक्टूबर 2025 के आदेश में ग्रामसभा की भूमि पर अतिक्रमण की सूचना न देने वाले प्रधान और लेखपाल की जवाबदेही, पद से हटाने की प्रक्रिया, तहसीलदार की भूमिका और वास्तविक कब्जा हटाने संबंधी निर्देशों…

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डिजिटल सबूत न्यूज़ | प्रयागराज/मिर्जापुर। उत्तर प्रदेश में ग्रामसभा और सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर अवैध कब्जे के मामलों में केवल अतिक्रमण करने वाले व्यक्तियों की ही नहीं, बल्कि अपने वैधानिक दायित्व पूरे न करने वाले संबंधित अधिकारियों और ग्राम प्रधानों की जवाबदेही का भी सवाल उठता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 6 अक्टूबर 2025 के आदेश में प्रदेश के जिलाधिकारियों और उपजिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि भूमि प्रबंधक समिति के अध्यक्ष ग्राम प्रधान तथा सचिव लेखपाल द्वारा अतिक्रमण की नियमानुसार सूचना न दिए जाने पर संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाए। आदेश में आपराधिक कार्रवाई और ग्राम प्रधान को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने संबंधी निर्देश भी शामिल हैं।

यह आदेश न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकल पीठ ने मनोज कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 12 अन्य, जनहित याचिका संख्या 2923/2025 में दिया। अदालत ने 6 अक्टूबर 2025 के इस आदेश को ए.एफ.आर. (रिपोर्ट किए जाने योग्य) भी चिह्नित किया। यह रिपोर्ट उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध 24 पृष्ठों के मूल आदेश पर आधारित है।

मिर्जापुर में बावली की भूमि से जुड़ा मामला, निर्देश पूरे प्रदेश के लिए

याचिका मिर्जापुर जिले की चुनार तहसील, ग्राम चौका की सार्वजनिक उपयोग की भूमि से संबंधित थी। याचिकाकर्ता ने गाटा संख्या 48 (0.177 हेक्टेयर), 51 (0.101 हेक्टेयर) और 53 (0.114 हेक्टेयर) पर कथित अतिक्रमण हटाने का अनुरोध किया था। याचिका के अनुसार, संबंधित भूमि राजस्व अभिलेखों में बावली के रूप में दर्ज थी। साथ ही 22 जुलाई 2024 के प्रत्यावेदन के निस्तारण की मांग की गई थी।

राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 67 के तहत अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही शुरू की गई थी। आदेश में उल्लेख है कि कथित अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध 7 अगस्त और 8 सितंबर 2025 को कार्यवाही प्रारम्भ की गई थी। इस प्रकरण की सुनवाई के दौरान अदालत ने सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा के संबंध में प्रदेशव्यापी निर्देश भी दिए।

प्रधान और लेखपाल की जिम्मेदारी: अतिक्रमण की नियमानुसार सूचना

अदालत ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 28-ए तथा 28-बी के तहत ग्राम प्रधान भूमि प्रबंधक समिति का अध्यक्ष और संबंधित क्षेत्र का लेखपाल उसका सचिव होता है। इस समिति पर ग्राम पंचायत को सौंपी गई सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण और प्रबंधन का दायित्व है। राजस्व संहिता नियमावली, 2016 के नियम 66 के तहत कब्जे की सूचना निर्धारित आर.सी. प्रपत्र-19 में सक्षम राजस्व अधिकारी को भेजी जानी चाहिए।

आदेश के अनुच्छेद 30 में सभी जिलाधिकारियों और उपजिलाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि जिन मामलों में लेखपाल या प्रधान नियमानुसार सूचना नहीं देते, उनमें संबंधित विधिक प्रावधानों के अंतर्गत कार्रवाई की जाए। न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 316 के तहत आपराधिक न्यासभंग तथा दुष्प्रेरण और आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित कार्रवाई का भी उल्लेख किया। इन निर्देशों का अर्थ किसी व्यक्ति को स्वतः दोषी ठहराना नहीं है। प्रत्येक मामले में लागू कानून, उपलब्ध साक्ष्यों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही कार्रवाई की जा सकती है।

वैधानिक दायित्व में विफल प्रधान के विरुद्ध पद से हटाने की प्रक्रिया

अदालत ने कहा कि अतिक्रमण की सूचना देने और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा का वैधानिक कर्तव्य निभाने में विफल ग्राम प्रधान के विरुद्ध उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 95(1)(g)(iii) के अंतर्गत पद से हटाने की कार्यवाही प्रारम्भ की जानी चाहिए। आदेश ने इसे सार्वजनिक भूमि के संरक्षक के रूप में प्रधान की जिम्मेदारी से जोड़ा है। हालांकि, प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश किसी ग्राम प्रधान की तत्काल या स्वतः पदच्युति नहीं है।

60 और 90 दिनों की समय-सीमा को कैसे समझें?

आदेश के अनुच्छेद 30 में प्रधान और लेखपाल द्वारा निर्धारित आर.सी. प्रपत्र-19 में अतिक्रमण की सूचना देने के संबंध में आदेश की तारीख से 60 दिनों की समय-सीमा का उल्लेख है। यह समय-सीमा 6 अक्टूबर 2025 के आदेश से जुड़ी है; इसे आज से शुरू होने वाली नई अवधि न समझा जाए।

राजस्व संहिता नियमावली के नियम 67(6) के अनुसार, धारा 67 की कार्यवाही को कारण बताओ नोटिस जारी होने के बाद 90 दिनों के भीतर पूरा करने का प्रयास होना चाहिए; देरी होने पर कारण दर्ज किए जाने चाहिए। अदालत ने कहा कि केवल बेदखली आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं—आदेश का मौके पर क्रियान्वयन, अवैध कब्जा हटाना और भूमि को उसके मूल स्वरूप में बहाल करना भी जरूरी है। अदालत ने संबंधित लोगों को सुनवाई का अवसर देकर अतिक्रमण हटाने और दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की प्रक्रिया 90 दिनों के भीतर किए जाने का निर्देश भी दिया।

तहसीलदार की देरी पर भी जवाबदेही; केवल अपील करने से रोक नहीं

अदालत ने निर्देश दिया कि यदि तहसीलदार या तहसीलदार (न्यायिक) धारा 67 की कार्रवाई तय अवधि में नहीं निपटाते और देरी के पर्याप्त कारण दर्ज नहीं करते, तो उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही शुरू की जाए। फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी बेदखली आदेश के विरुद्ध केवल अपील लंबित होने से उसके क्रियान्वयन पर स्वतः रोक नहीं लगती; इसके लिए सक्षम मंच का स्पष्ट स्थगन आदेश आवश्यक है।

सूचना देने वाले को कार्रवाई से अवगत कराना होगा

फैसले के अनुच्छेद 33 के अनुसार संबंधित अधिकारी उठाए गए कदमों की सूचना शिकायतकर्ता या सूचना देने वाले व्यक्ति को देंगे और कार्यवाही के प्रत्येक चरण में उसे सुनवाई का अवसर दिया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य की सार्वजनिक भूमि पर कब्जे के मामले में जिम्मेदार प्रधान, लेखपाल या अन्य अधिकारी द्वारा सूचना न देने की स्थिति में आदेश की अवहेलना को लेकर हाईकोर्ट में सिविल अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का रास्ता खुला है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध अवमानना स्वतः सिद्ध हो गई है।

उच्च अधिकारियों तक जवाबदेही, हर वर्ष कार्रवाई की जानकारी

न्यायालय ने कहा कि सरकारी अथवा स्थानीय निकाय की भूमि पर अतिक्रमण की जानकारी किसी अन्य माध्यम से उच्च अधिकारी के संज्ञान में आती है और फिर भी जिम्मेदार अधीनस्थ अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की जाती, तो उच्च अधिकारी की भूमिका की भी जांच का प्रश्न उठ सकता है। आदेश में मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिवों/प्रमुख सचिवों, मंडलायुक्तों, जिलाधिकारियों और संबंधित विभागों तक निर्णय पहुंचाने को कहा गया है। साथ ही संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को प्रत्येक वर्ष अतिक्रमण हटाने तथा दोषी अधिकारियों पर हुई कार्रवाई की जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश हैं।

तालाब और सार्वजनिक जलस्रोतों का संरक्षण संवैधानिक जिम्मेदारी

हाईकोर्ट ने तालाब, बावली और अन्य जलस्रोतों पर कब्जे के पर्यावरणीय नुकसान का उल्लेख करते हुए कहा कि इनका संरक्षण स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार और सार्वजनिक हित से जुड़ा हुआ है। न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व फैसलों का भी उल्लेख किया और सार्वजनिक उपयोग की भूमि को राजस्व अभिलेख में दर्ज उसके मूल प्रयोजन के अनुरूप बहाल करने पर जोर दिया।

अक्टूबर 2026 तक आदेश के अनुपालन की स्थिति

यह 2025 का न्यायिक आदेश है। अक्टूबर 2026 तक राज्यभर में कितने ग्राम प्रधानों, लेखपालों, तहसीलदारों या अन्य अधिकारियों के खिलाफ इसके आधार पर कार्रवाई हुई, इसका समेकित आधिकारिक विवरण इस रिपोर्ट के लिए स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुआ है। इसलिए इस खबर में किसी विशिष्ट जिले या अधिकारी द्वारा आदेश की अवहेलना किए जाने का दावा नहीं किया जा रहा है। आदेश के अनुपालन की वास्तविक स्थिति जानने के लिए संबंधित नोटिस, बेदखली की कार्यवाही, विभागीय आदेश और सरकारी रिकॉर्ड की अलग से जांच आवश्यक है।

मूल दस्तावेज: इलाहाबाद हाईकोर्ट, PIL संख्या 2923/2025, मनोज कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 12 अन्य, आदेश दिनांक 06-10-2025, अनुच्छेद 28–39। उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर पूरा आदेश पढ़ें।

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ASHEESH CHAUHAN

Editorial Desk

The editorial and verification desk of Digital Saboot News.

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