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अलीगढ़: 15 दिन में जांच आख्या का निर्देश, छह सप्ताह बाद भी सवाल; लहरा सलेमपुर में आदेश का कितना पालन हुआ?

7 सितंबर के पत्र में जिला समाज कल्याण अधिकारी को लहरा सलेमपुर की शिकायत पर दोनों पक्षों को सूचना देकर स्थलीय, अभिलेखीय जांच और साक्ष्य-फोटो सहित एक पक्ष में रिपोर्ट देने को कहा गया। 42 दिन बाद शिकायतकर्ता…

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डिजिटल सबूत न्यूज़ | दस्तावेज़ आधारित विशेष रिपोर्ट | अलीगढ़/बिजौली, 19 अक्टूबर 2026। ग्राम पंचायत लहरा सलेमपुर में सरकारी धन के कथित दुरुपयोग, संदिग्ध भुगतान और विकास कार्यों की शिकायत पर जिला प्रशासन ने सितंबर में विस्तृत जांच के निर्देश दिए थे। 7 सितंबर 2026 के दो पृष्ठीय पत्र में जिला पंचायत राज अधिकारी, अलीगढ़ ने जिला समाज कल्याण अधिकारी/जांच अधिकारी को दोनों पक्षों को सूचित करने के बाद मौके पर अभिलेखीय, तथ्यात्मक और स्थलीय जांच कर एक पक्ष (लगभग 15 दिन) में साक्ष्य, फोटोग्राफ और संस्तुति सहित रिपोर्ट मांगी थी।

पत्र की तारीख से 42 दिन बीत चुके हैं। इस बीच शिकायतकर्ता विष्णु गुप्ता ने आरोप लगाया है कि आदेशानुसार मौके पर जांच, उनका पक्ष सुनने और साक्ष्यों का परीक्षण करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। दस्तावेज से जांच कराने का निर्देश पुष्ट होता है, जबकि निर्देशों का उल्लंघन हुआ या जांच पूरी हुई—इसकी पुष्टि विभाग के प्राप्ति रजिस्टर, स्थलीय निरीक्षण और जांच आख्या से ही की जा सकती है। इन्हीं अभिलेखों का विवरण फिलहाल इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध नहीं है।

जिलाधिकारी के आदेश का हवाला, जांच अधिकारी नामित

उपलब्ध पत्र जिला पंचायत राज अधिकारी, अलीगढ़ के कार्यालय से जिला समाज कल्याण अधिकारी, अलीगढ़/जांच अधिकारी को भेजा गया है। उस पर 7 सितंबर 2026 की तारीख और हस्तलिखित पत्रांक दर्ज है। पत्र में बताया गया है कि जिलाधिकारी, अलीगढ़ के उसी तारीख के आदेश से उन्हें जांच अधिकारी नामित किया गया था। जिलाधिकारी के मूल नामांकन आदेश की अलग प्रति इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध नहीं है।

जांच का आधार विष्णु गुप्ता पुत्र प्रेम स्वरूप गुप्ता की 1 जून 2026 की शिकायत और नोटरी के समक्ष सत्यापित शपथपत्र बताया गया है। आदेश में शिकायत से जुड़े सभी बिंदुओं और तथ्यों की जांच करने को कहा गया है; यह किसी व्यक्ति के दोषी पाए जाने का आदेश नहीं है।

जांच आदेश के स्पष्ट निर्देश: दोनों पक्षों को सूचित कर अभिलेखीय एवं स्थलीय जांच

पत्र में जांच अधिकारी से अपेक्षा की गई थी कि “उभय पक्ष को सूचित करने के उपरान्त” मौके पर नियमानुसार “अभिलेखीय, विस्तृत, तथ्यात्मक एवं स्थलीय गहन जांच” की जाए। इसके बाद सुस्पष्ट जांच आख्या, संस्तुति, साक्ष्य और फोटोग्राफ “एक पक्ष के अन्दर” जिला पंचायत राज अधिकारी के कार्यालय में उपलब्ध कराए जाएं।

पत्र के अनुसार, इसी रिपोर्ट के आधार पर संयुक्त जांच आख्या मुख्य विकास अधिकारी और जिलाधिकारी के सामने प्रस्तुत कर प्रकरण के नियमानुसार निस्तारण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जानी थी। इसलिए जांच का मूल रिकॉर्ड केवल अंतिम शिकायत-निस्तारण संदेश नहीं, बल्कि दोनों पक्षों की सूचना, स्थल निरीक्षण, देखे गए अभिलेख, साक्ष्य, फोटो, जांच अधिकारी की संस्तुति और आगे भेजी गई आख्या है।

एक पक्ष की अवधि बीती; जांच की स्थिति क्यों स्पष्ट नहीं?

7 सितंबर से 19 अक्टूबर तक 42 दिन का अंतर है। हालांकि एक पक्ष की निर्देशित अवधि की सटीक शुरुआत तय करने के लिए यह देखना जरूरी है कि पत्र जांच अधिकारी के कार्यालय में किस तारीख को प्राप्त हुआ और क्या बाद में अवधि बढ़ाई गई। दोनों रिकॉर्ड अभी उपलब्ध नहीं हैं। लिहाजा रिपोर्ट को निश्चित संख्या में दिन ‘विलंबित’ घोषित करना अभी संभव नहीं है।

शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्हें उस ढंग से जांच किए जाने की जानकारी नहीं है जैसा पत्र में निर्देशित है। उन्होंने पूर्व की जांच प्रक्रियाओं पर भी आपत्ति जताई है और मौके पर वास्तविक निर्माण, आपूर्ति तथा भुगतान रिकॉर्ड का परीक्षण न होने का आरोप लगाया है। उनके इस आरोप को परखने के लिए विभागीय निरीक्षण पंजिका, पत्रों की प्राप्ति और दोनों पक्षों को भेजी सूचना निर्णायक होगी। शिकायतकर्ता को जानकारी न मिलना और जांच का वास्तव में न होना दो अलग तथ्य हैं; इस अंतर को स्पष्ट करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

शिकायत में किन वित्तीय मामलों की जांच मांगी गई?

7 सितंबर के पत्र के विषय और विवरण में ग्राम पंचायत के एक करोड़ रुपये से अधिक के कथित संदिग्ध भुगतान, फर्जी अथवा बोगस बिलिंग, जीएसटी पंजीकरण निरस्त होने के बाद भुगतान, कथित कूटरचित अथवा अहस्ताक्षरित बिल, नाला निर्माण, बोरिंग, मशीनरी व सामग्री आपूर्ति के नाम पर भुगतान, स्टॉक हेराफेरी, मनरेगा और सरकारी धन के कथित दुरुपयोग के आरोप शामिल हैं।

पत्र में ग्राम प्रधान के नाम पर मानदेय के अतिरिक्त अन्य मदों में ₹2,08,850 के कथित भुगतान का भी उल्लेख है। शिकायतकर्ता ने संबंधित अधिकारियों व फर्मों की संभावित मिलीभगत, बैंक खातों की जांच, अभिलेख सुरक्षित करने, वसूली, ब्लैकलिस्टिंग और एफआईआर जैसी कार्रवाई की मांग की थी। ये आरोप और जांच संबंधी मांगें हैं, सत्यापित गबन या दोषसिद्धि नहीं। किसी भी राशि का वास्तविक वित्तीय प्रभाव तभी तय होगा जब मूल बिल, वाउचर, बैंक भुगतान, स्टॉक और कार्यस्थल के रिकॉर्ड मिलाए जाएंगे।

दूसरे पृष्ठ से स्पष्ट: रिकॉर्ड देना ब्लॉक कार्यालय और सचिव की जिम्मेदारी

पत्र की प्रतिलिपि सूची में जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी को जानकारी के लिए प्रति भेजने का उल्लेख है। खंड विकास अधिकारी, बिजौली को निर्देश दिया गया कि जांच अधिकारी को ग्राम पंचायत के वांछित सभी अभिलेख समय से उपलब्ध कराएं और जांच में पूरा सहयोग करें। सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) को आवश्यक कार्रवाई के लिए पत्र भेजा गया। सचिव/प्रशासक, ग्राम पंचायत लहरा सलेमपुर को भी संबंधित अभिलेख जांच अधिकारी को उपलब्ध कराने और सहयोग सुनिश्चित करने को कहा गया। शिकायतकर्ता विष्णु गुप्ता को सूचनार्थ प्रति भेजे जाने का भी उल्लेख है।

पत्र में दर्ज प्रतिलिपि सूची से संबंधित कार्यालयों में पत्र की वास्तविक प्राप्ति, रिकॉर्ड सौंपे जाने या जांच पूरी होने की पुष्टि नहीं होती। इसके लिए डिस्पैच रजिस्टर, प्राप्ति, रिकॉर्ड हस्तांतरण और जांच अधिकारी का पत्राचार देखना होगा।

पहले भी जांच और कार्रवाई की खबरें; इस आदेश का दायरा अलग

समाचार का संज्ञान, जी.डी. कंस्ट्रक्शन पर कार्रवाई और व्यापक शिकायत की जांच: ग्राम पंचायत लहरा सलेमपुर में कथित अनियमितताओं के संबंध में विष्णु गुप्ता और ग्रामीणों द्वारा उठाए गए मुद्दों के आधार पर पहले समाचार प्रकाशित होने की बात सामने आई है। शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्हीं समाचारों का संज्ञान लेकर मुख्य विकास अधिकारी ने प्रारंभिक जांच के निर्देश दिए थे। 25 जून 2026 की जिला सूचना कार्यालय की प्रेस विज्ञप्ति में संयुक्त जांच के बाद जी.डी. कंस्ट्रक्शन के विरुद्ध ब्लैकलिस्टिंग की प्रक्रिया तथा एफआईआर दर्ज कराने के निर्देशों का उल्लेख है। इसके अनुपालन में 29 जून 2026 को थाना दादों में प्राथमिकी संख्या 0177/2026 दर्ज हुई, जिसमें जी.डी. कंस्ट्रक्शन को आरोपी फर्म के रूप में दर्ज किया गया। दूसरी ओर, विष्णु गुप्ता ने 1 जून 2026 को शपथपत्र सहित व्यापक वित्तीय अनियमितताओं की शिकायत भी की थी। इस विस्तृत शिकायत के संदर्भ में 7 सितंबर 2026 के जिला पंचायत राज अधिकारी के पत्र ने जिला समाज कल्याण अधिकारी को सभी बिंदुओं की अभिलेखीय एवं स्थलीय जांच करके साक्ष्य सहित आख्या देने को कहा। इस प्रकार एक फर्म के विरुद्ध जून की कार्रवाई को 1 जून की पूरी शिकायत का अंतिम निस्तारण नहीं माना जा सकता। सितंबर के आदेश के अनुपालन की पुष्टि के लिए जांच आख्या और संबंधित कार्यालयी अभिलेख अब भी आवश्यक हैं।

डिजिटल सबूत न्यूज़ ने 10 जुलाई की खबर में शिकायतकर्ता द्वारा उठाए गए लगभग ₹86 लाख के भुगतान, निर्माण और जीएसटी-संबंधी आरोपों का उल्लेख किया था। 25 जुलाई की रिपोर्ट में पूर्व विभागीय कार्रवाई के संदर्भ में जी.डी. कंस्ट्रक्शन से जुड़ी प्राथमिकी संख्या 0177/2026 (29 जून 2026, थाना दादों) और एक फर्म संबंधी प्रशासनिक कार्रवाई के उल्लेख भी प्रकाशित हुए थे। इस समाचार के लिए उस प्राथमिकी की वर्तमान जांच-स्थिति का अलग सत्यापन नहीं हुआ है।

इन सात अभिलेखों से खुलेगी जांच की वास्तविक स्थिति

  1. आदेश की प्राप्ति: जिला समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में पत्र कब और किस डायरी संख्या पर प्राप्त हुआ?
  2. दोनों पक्षों को सूचना: किस तारीख के पत्र/नोटिस से शिकायतकर्ता तथा संबंधित पंचायत पक्ष को जांच की जानकारी दी गई और सेवा प्रमाण क्या है?
  3. मौके का निरीक्षण: ग्राम पंचायत में जांच अधिकारी कब पहुंचे, किन कार्यस्थलों को देखा और निरीक्षण विवरण व फोटोग्राफ कहां हैं?
  4. दस्तावेज़ों की उपलब्धता: खंड विकास अधिकारी तथा सचिव/प्रशासक ने किस तारीख को कौन-कौन से मूल अभिलेख सौंपे?
  5. आर्थिक परीक्षण: बिल, जीएसटी की संबंधित तिथि की स्थिति, माप पुस्तिका, स्टॉक रजिस्टर, eGramSwaraj/PFMS और बैंक प्रविष्टियों का क्या मिलान हुआ?
  6. एक पक्ष की रिपोर्ट: जांच आख्या, संस्तुति और साक्ष्य जिला पंचायत राज अधिकारी कार्यालय को कब प्राप्त हुए? कोई अनुस्मारक अथवा समयवृद्धि हुई?
  7. उच्चाधिकारियों की कार्रवाई: संयुक्त आख्या मुख्य विकास अधिकारी/जिलाधिकारी को कब प्रस्तुत हुई और उस पर क्या लिखित कार्रवाई दर्ज है?

विभागीय लापरवाही का आरोप: निष्कर्ष रिकॉर्ड आने के बाद

शिकायतकर्ता ने जांच प्रक्रिया में देरी और आदेश के अनुरूप स्थलीय जांच न होने की बात उठाई है। आरोप गंभीर हैं, क्योंकि आदेश में दोनों पक्षों की सूचना से लेकर साक्ष्ययुक्त जांच आख्या तक स्पष्ट चरण लिखे हैं। यदि इनका पालन नहीं हुआ तो देरी और जवाबदेही का प्रश्न बनता है। दूसरी ओर, यदि जांच अधिकारी ने कार्यवाही की है तो उसकी तारीखवार रिपोर्ट, नोटिस और फोटोग्राफ प्रस्तुत होने पर वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

जिला समाज कल्याण अधिकारी (नामित जांच अधिकारी) का पक्ष अपेक्षित है। इस रिपोर्ट के प्रकाशन-पूर्व उपलब्ध अभिलेखों में संबंधित जांच अधिकारी का लिखित जवाब या जांच आख्या शामिल नहीं है। जिला पंचायत राज अधिकारी, खंड विकास अधिकारी और संबंधित ग्राम पंचायत का अद्यतन पक्ष भी उपलब्ध नहीं है। संबंधित अधिकारियों को इस समाचार के लिए प्रश्न भेजे जाने या संपर्क किए जाने की पुष्टि नहीं है। जिला समाज कल्याण अधिकारी (नामित जांच अधिकारी) का पक्ष प्राप्त होने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

संपादकीय तथ्य-जांच: 7 सितंबर के दो पृष्ठीय पत्र की उपलब्ध स्कैन प्रतियों का दृश्य-परीक्षण हुआ है। मूल निर्गमन/प्राप्ति रजिस्टर, जिलाधिकारी का पृथक नामांकन आदेश, जांच अधिकारी की डायरी और अंतिम आख्या उपलब्ध नहीं हैं। इस खबर में जांच निर्देशों को दस्तावेज़ आधारित तथ्य, तथा जांच न होने को शिकायतकर्ता का आरोप माना गया है। वर्तमान Featured Image में ’42 दिन’ का उल्लेख 7 सितंबर से 19 अक्टूबर 2026 तक के कैलेंडर अंतर का संदर्भ है; इसमें उपलब्ध पत्रों की छवियों के साथ संपादकीय डिज़ाइन शामिल है।

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ASHEESH CHAUHAN

Editorial Desk

The editorial and verification desk of Digital Saboot News.

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